नमस्कार! सोमवार की इस हलचल मे आपका स्वागत है इन खास लिंक्स के साथ--
(1)
हैलो जी अंतर्यामी जी !!
आप से कुछ बात करनी थी
क्योंकि मैं थोड़ा
(2)
एक आलौकिक अनुभूति
होती है
जब साथ होते हैं
मैं और मेरा कंप्यूटर
(3)
मुझे नौकरी चाहिए..
और साथ मे चाहिये
(4)
रे मन ... पथिक ...रसिक ....अलबेला ....!!
कि हो चुका
अंत उफ़ आसान थोड़ा-
(5)
और
ये कैसी रिश्तों की विदाई
जो अब तक समझ न आई
(6)
जब तुम दूर होते हो
तब एहसास होता है
कि हूँ
मैं तेरी प्रतिबिम्ब
और चलते चलते यह गाना सुनते हुए इजाजत दीजिये यशवंत माथुर को --
"हैलो जी अंतर्यामी जी"मैं थोड़ी सी घबड़ा गई हूँ"एक आलौकिक अनुभूति"..... !!
ReplyDeleteमन में हलचल पैदा कर रही आज की हलचल नई पुरानी , अन्तर्यामी ने मन की सारी उलझन सुलझाने की ठानी |मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार |
ReplyDeleteआशा
प्रस्तुतीकरण सूत्रों की रोचकता और उभार देता है।
ReplyDeletebahut sundar prastuti
ReplyDeleteबहुत सुंदर प्रस्तुति यशवंत....
ReplyDeleteजब तुम दूर होते हो
तब एहसास होता है
कि हूँ
मैं तेरी प्रतिबिम्ब
बहुत खूब....
सस्नेह.
सुंदर क्षणिकाओं से सजी ....सुंदर हलचल ...लिंक्स भी बढ़िया ...
ReplyDeleteआभार ...इस हलचल में मेरी रचना को स्थान दिया ...यशवंत जी ...उम्मीद है आज मेरा कमेन्ट स्पैम में नहीं जायेगा .. ....
क्षणिकाओं में सजी सुंदर हलचल ....
ReplyDeleteबहुत बढि़या।
ReplyDeleteacchi.links....
ReplyDeleteप्रस्तुतीकरण बहुत रोचक है........
ReplyDeleteसुन्दर हलचल के साथ गज़ब का गीत.
ReplyDeleteयशवंत जी और नयी -पुरानी हलचल के सभी सदस्यों को मेरा हार्दिक आभार........
ReplyDeleteबहुत सुंदर क्षणिकाओं के मध्य से सुन्दर लिंक्स के साथ सार्थक हलचल प्रस्तुति में मुझे शामिल करने के लिए आभार!
ReplyDeleteमुझे शामिल करने के लिए ,थैंक्स.प्रस्तुति का ढंग और गीत बहुत पसंद आया.
ReplyDeletenice effort yash ji .
ReplyDeleteand thanks for including me here .....
sunder prastuti sunder rachnaon ki 'links' ke saath va ek atyant ki khoobsurat geet ka saath.
ReplyDeletemeri rachna ko sneh dene liye abhaar.
shubhkamnaon sahit
Der me ane ke liye maphi meri rachana ko Ethan dene ke liye aabhar...
ReplyDelete